मेघा

मलमल के आँचल से अपने, सूर्य की की किरनों को ढपना
मेघ जो बरसो कहीं भी, आठों पहर तुम बरसना

खनक गर्जन में हँसी की, बिजली सी मुस्कान लिए
सुकोमल पैरों से छत पे, टप टप की थाप दिए

हो व्यथित ना ह्रदय कोई, तन मन में उल्लास भरना
मेघ जो बरसो कहीं भी, आठों पहर तुम बरसना

खुशबुओं में ओत प्रोत, खुलें जल के सभी स्रोत
रितु भीगी आतुर नयन हों, मिलन को व्याकुल युगल हों

द्रवित मन की खिड़कियों में, प्रेमिका का रूप धरना
मेघ जो बरसो कहीं भी, आठों पहर तुम बरसना

रात्रि के दूजे पहर में, दबे पाँव चल डगर में
दूब गीली को जगाकर, पूछ लेना लह लहाकर

सुन सहेली मैं हूँ आई, हाथ मेहँदी से है रचना
मेघ जो बरसो कहीं भी, आठों पहर तुम बरसना

सूर्य की पहली किरन, जब चूम लेती हो धरा को
अलसाई सी धूप देकर, विदा होना पड़े तुमको

जाते जाते फिर सजाना, इन्द्रधनुषी इस गगन को
ओस की हर बूंद पे तुम, नाम अपना छोड़ रखना

मेघ जो बरसो कहीं भी, आठों पहर तुम बरसना

-अंकुर

(I wrote this poem last year for a friend on her birthday. Posted here with her permission)

5 Responses

  1. acha to yeh private ko aaj public bana diya gaya?

  2. Yes, I like this poem a lot. I thought it would be nice to share.

  3. Its a beautiful poem, Ankur. Have you written anything else since?

  4. Thanks Priya, no I have not written anything after this.

  5. Beautiful!! Quite beautiful! And i do believe i know the source, so interesting too :-D !!

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